top of page

मेरा सच

nirajnabham
2 अक्टू॰ 2023
1 मिनट पठन

सच कहता हूँ नहीं जानता था

कि मेरा सच मुझे ही

नंगा कर देगा वह भी सरे राह

शर्म की चादर लिए आँखों में

खड़ा रहा वहीं किनारे इंतज़ार में

और वह चला गया

भागता ही चला गया

वह जो अनावृत मैं था।

गुम होना ही नियति है

उसका भी जो गुम गया

अनावृतों के अथाह समुद्र में

उसका भी जो खड़ा रहा इंतज़ार में

आँखों में शर्म की चादर लिए

और गुम होता रहा

धरती में, आसमान में

खड़ा रहा और गुम होता रहा।

गुम होना ही नियति है

फिर भी कठिन है देखना

गुम होते हुए अपने आप को

कई तरह से, बार-बार, कई बार

लेकिन कहाँ गुम हो पाता कोई

उस तरह जिस तरह वह चाहता है

गुम होना – अपने आप में

अपने पूरे अस्तित्व के साथ ।

गुम होने से ही तो आता है

अहसास अस्तित्व का – इसलिए

गुम होना ही नियति है

जो हो कर भी गुम नहीं होता

वह खटकता रहता है

अहम की तरह, काँटे की तरह

पुरानी किसी चोट की तरह

टीसता है, तड़पता है, भागता है

समझता है – यही है ज़िंदगी

मेरे तरह, तुम्हारी तरह, सबकी तरह

सच कहता हूँ नहीं जानता था

कि मेरा सच मुझे ही

नंगा कर देगा वह भी सरे राह।

हाल ही के पोस्ट्स

सभी देखें
आत्म स्वीकृति

तुम मिलोगी- तो ये आँखें नम होंगी तुम कहोगी मैं सुनूँगा पर बात कम होगी। तुम क्या हो मैं क्या हूँ सोचने से उमंगें कम होंगी। तुम चलती रहो...

 
 
 
डर

कभी-कभी लगता है नहीं होगी अगली सुबह चढ़ती रात के साथ बढ़ता है डर डर मौत का या जिंदगी का! अगले दिन की अलसाई सुबह करवट बदलता हूँ बिस्तर पर...

 
 
 
अस्तित्व

घटाटोप अंधकार में कामना की मैंने प्रकाश की मैं जो था ईश्वर किरणों पर सवार होकर चला नि:सीम यात्रा पर प्रकाश सिरजता चला राह में अंधकार चलता...

 
 
 

टिप्पणियां


9760232738

  • Facebook
  • Twitter
  • LinkedIn

©2021 by Bhootoowach. Proudly created with Wix.com

bottom of page