अस्तित्व
घटाटोप अंधकार में
कामना की मैंने प्रकाश की
मैं जो था ईश्वर
किरणों पर सवार होकर
चला नि:सीम यात्रा पर
प्रकाश सिरजता चला राह में
अंधकार चलता रहा साथ में
सृष्टि का होता रहा विस्तार
पर मिटा नहीं अंधकार
मैं जो कि हूँ ईश्वर
चाह नहीं सकता चाह कर
घूमता किरणों पर सवार
पर मुझसे आगे है अंधकार
(क्योंकि) मुझसे पहले था अंधकार
घनीभूत अंधकार था चरम
जब जाना अपने होने का मरम(मर्म)
हुआ होने का मात्र अहसास
अंधकार लगाने लगा संत्रास
मेरे पहली चाहत है प्रकाश
जानता है अंधकार
प्रकाश से परे हट जाता है
पर प्रकाश कहीं नहीं जाता है
मेरे साथ थक कर
अंधकार में सिमट जाता है
अंधकार में चाहत नहीं होती
इसलिए फैलता है प्रकाश
सिमटता है अंधकार
प्रकाश विस्तार है
आदि-अंत अंधकार है
बिन्दु से बिन्दु तक
जाता है प्रकाश
बिन्दु जो है अंधकार
बिन्दु जो जगह नहीं घेरता
सिर्फ होता है।
टिप्पणियां