डर
कभी-कभी लगता है
नहीं होगी अगली सुबह
चढ़ती रात के साथ बढ़ता है डर
डर मौत का या जिंदगी का!
अगले दिन की अलसाई सुबह
करवट बदलता हूँ बिस्तर पर
जैसे लौटा हूँ जला कर
अपनी ही लाश
मन में गूँजता है खालीपन
तन में डोलता है भारीपन
खालीपन जिंदगी का
भारीपन मौत का
ऐसी ही किसी सुबह-
लगता है ठहर जाए समय
जिसके पीछे है रात आगे है दिन
जिसके एक हाथ में है-
खाली जिंदगी और एक में भारी मौत
ठहर ही जाए समय सदा के लिए
क्योंकि मजबूर करता है- समय
चुनने के लिए –
खालीपन की जिंदगी
या मौत का भारीपन
लेकिन नहीं ठहरता है समय
रोशनी झकझोर देती है
शुरू हो जाता है- एक और दिन
छोड़ जाता है- एक रात
घनी अंधियारी भारी रात
वह रात जो डराती है
जिसकी सुबह अलसाती है
नहीं ठहरता है समय
एक पल भी नहीं
कि सोचा जा सके
क्या है अभीष्ट
जिंदगी जो खाली है
मौत जो भारी है
निर्णय का नहीं है अवकाश
इसलिए हैं दोनों बारी-बारी
दिन और रात की तरह
रात और दिन की तरह।
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