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क्या-क्या गिनोगे

nirajnabham
12 जन॰ 2025
1 मिनट पठन

आधी रात में उचटी नींद

आधी राह की थकान

आँखों का पहला ख़ुमार

सीने की, पहली जलन

पाँव के छाले

हाथ के फफोले

कितना गिनोगे

टूटी उम्मीद की किरचें

शगुन वाला सिक्का

आँखों में अंटकी मुस्कान

उपेक्षाजन्य तिरस्कार

कौंधती उम्मीद

बेख्वाब आँखों के आँसू  

क्या-क्या गिनोगे

उठता तूफान, टूटते किनारे

जलता आशियाना

अरुणाभ आसमान 

बिखरे सपने, हँसते फूल 

कमरे में फुदकती गौरैया

खिड़की पर दम तोड़ती धूप

कितना गिनोगे

क्या-क्या गिनोगे

गिनने से नींद आती है

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आत्म स्वीकृति

तुम मिलोगी- तो ये आँखें नम होंगी तुम कहोगी मैं सुनूँगा पर बात कम होगी। तुम क्या हो मैं क्या हूँ सोचने से उमंगें कम होंगी। तुम चलती रहो...

 
 
 
डर

कभी-कभी लगता है नहीं होगी अगली सुबह चढ़ती रात के साथ बढ़ता है डर डर मौत का या जिंदगी का! अगले दिन की अलसाई सुबह करवट बदलता हूँ बिस्तर पर...

 
 
 
अस्तित्व

घटाटोप अंधकार में कामना की मैंने प्रकाश की मैं जो था ईश्वर किरणों पर सवार होकर चला नि:सीम यात्रा पर प्रकाश सिरजता चला राह में अंधकार चलता...

 
 
 

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