मेरे जैसा लगता है
वह शख्स वहीं था जो सच में मेरे जैसा लगता है
क्या है उसकी बातों में क्यों अनजाना वो लगता है
ढूँढता है जो एक कोना अँधेरे का दिन में उसे
रोशन न हो हर कोना तो रात को डर लगता है
तनहाई, थकान, डर या सच में पसीना आया
सैर में सब आते हैं सैर में दिल नहीं लगता है
फासले मिट जाएंगे तो क्या रह जाएगा राबता
राह में खिले फूलों के सूखने का डर लगता है
क्या कर नहीं सकता इंसान जो करना चाहे
जी में आए है वो न कर दूँ कहीं डर लगता है
जिस मोड़ से मुड़ा था उसी राह गई थी तुम
मैं घाट पर खड़ा हूँ तेरे हाल पर डर लगता है
सो गया मेरा क़ातिल मेरा इंतज़ार कर-कर
ख्वाबों में ही सही वह मासूम मगर लगता है
ले कर चलते है नसीब अपने साथ हर जगह
शरारती बच्चों को घर जाने से डर लगता है।
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