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बुरा मान गए

nirajnabham
12 जन॰ 2025
1 मिनट पठन

दर्द ए दिल जुबान पे आया तो बुरा मान गए

जख्मों के दिए दर पे सजाया तो बुरा मान गए

 

ख्वाब अब भी आते हैं सूनी डाल पर परिंदों की तरह

बेनूर आँखों मे भी आते हैं ख्वाब सुना तो बुरा मान गए

 

छा गई मस्ती हर ओर ये आलम था अपने जुनून का

कुछ यूँ जुड़ा मजमा मेरी कब्र पर कि वे बुरा मान गए

 

हर गुनाह को पुर लुत्फ बनाता चला गया दीवाना

देने लगा काँधा अपने जनाजे को तो बुरा मान गए

 

एक ही गुनाह तो करता आया था कितने जमाने से

शर्माना जो छोड़ा अपने गुनाह पर तो बुरा मान गए

 

दरपेश तो होंगी दुश्वारियां तमाम लम्बे सफर में

उठ कर चले उनकी ठोकरों से तो बुरा मान गए

 

हर शख्स अजनबी है यहाँ हर सवाल है बेमानी

इजहार-ए-हाल भी न कर पाया तो बुरा मान गए।

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कोई दीवाना नहीं आता आजकल इन गलियों में

चाँदनी रोती रही फिर तनहाई से लिपट कर आँसू जमा करती रही रात चादर बिछा कर क्या कुछ न कहा उनसे इजहार-ए-हाल के सिवा वो भी सुनते रहे फ़ासलों का समंदर बिछा कर फिर जो पूछा जिंदगी से क्या चाहिए आखिर तुम्ह

 
 
 
कर लिया सख्त इरादा अपना

जुबां पर सख्त है पहरा तो कर लिया सख्त इरादा अपना उठाया गया जो महफिल से हो गया मुकाबिल-ए-हुस्न आशिकी अपना लिया हाथ में पैमाना तो दिल...

 
 
 

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