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नज़र-ए-इनायत उनका

nirajnabham
2 अक्टू॰ 2023
1 मिनट पठन

जमाने भर की आहों से लरज़ता रहा दिल उनका

रस्म-ए-वफ़ा समझ उठाते रहे हर सितम उनका


दिए की लौ हो जाएगी एक दिन हवाओं पे सवार

बिछेगा राह में उस शमा-ए-नूर के दामन उनका


न आऊँ उनके ख्वाब में ये उन्हें मंजूर नहीं

मेरी बेख्वाब आँखों से नहीं कोई वास्ता उनका


इश्क़ की आग में जलकर कुन्दन हुआ जाता हूँ

जलाने की आदत से न छूटा कभी नाता उनका


मिट गयी ख़ुदी इश्क़ में तो ख्वाहिशें भी मिट गईं

बस गया है इस नज़र में नज़रों से मुस्कराना उनका


हम क्या हैं कि- करे कोई हमारी परवाह भला

लुत्फ़-ओ-इनायत सोच में, बाकी नज़र-ए-इनायत उनका

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चाँदनी रोती रही फिर तनहाई से लिपट कर आँसू जमा करती रही रात चादर बिछा कर क्या कुछ न कहा उनसे इजहार-ए-हाल के सिवा वो भी सुनते रहे फ़ासलों का समंदर बिछा कर फिर जो पूछा जिंदगी से क्या चाहिए आखिर तुम्ह

 
 
 
कर लिया सख्त इरादा अपना

जुबां पर सख्त है पहरा तो कर लिया सख्त इरादा अपना उठाया गया जो महफिल से हो गया मुकाबिल-ए-हुस्न आशिकी अपना लिया हाथ में पैमाना तो दिल...

 
 
 

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