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दूरियाँ बेहद करीब सी हैं

nirajnabham
12 जन॰ 2025
1 मिनट पठन

दिल ए खस्ता की आदतें कुछ अजीब सी हैं

गम ए हस्ती के मारों की हरकतें रकीब सी हैं

 

उसे तकलीफ बहुत है मेरी साफगोई से

उसके अंदाज ए नुक्ताचीं मेरे हबीब सी हैं

 

हर रोज पिघलता है सूरज जिनकी पेशानी पर

हौसला बहुत रखते है बस किस्मतें गरीब सी हैं

 

मत पूछ क्या-क्या न हुआ इस दिल के साथ

कहा जो ख्वाबों में उनकी तस्वीर हबीब सी हैं

 

तौबा जो कर लिया आशिकी से उनके कहे

कहने लगे ये भी आशिकी की तरकीब सी हैं

 

न आशिकी माँगी हमने न हुस्न उसने खुदा से

कहा शेख साहब ने ये बातें अपने नसीब सी हैं

 

मुस्करा के देखा और अपनी राह चली गई

कुछ दूरियाँ मेरे आज भी बेहद करीब सी हैं

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कोई दीवाना नहीं आता आजकल इन गलियों में

चाँदनी रोती रही फिर तनहाई से लिपट कर आँसू जमा करती रही रात चादर बिछा कर क्या कुछ न कहा उनसे इजहार-ए-हाल के सिवा वो भी सुनते रहे फ़ासलों का समंदर बिछा कर फिर जो पूछा जिंदगी से क्या चाहिए आखिर तुम्ह

 
 
 
कर लिया सख्त इरादा अपना

जुबां पर सख्त है पहरा तो कर लिया सख्त इरादा अपना उठाया गया जो महफिल से हो गया मुकाबिल-ए-हुस्न आशिकी अपना लिया हाथ में पैमाना तो दिल...

 
 
 

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