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दरिया

nirajnabham
2 अक्टू॰ 2023
1 मिनट पठन

बहार आई नहीं पर क़रार लेकर आ गया दरिया

बुझ गई प्यास तो शराब लेकर आ गया दरिया


कुछ तो है अबके बहार में गुल भी खिल रहे कतार में

न शोख़ी न गुस्ताख़ी क्या पिला कर चला गया दरिया


गुम गए थे जमीं में जो इज़हार जुबां से फिसल कर

पत्थर पे उगे फूलों को महका कर चला गया दरिया


जी नहीं करता दिल लगाने को इस शहर बेलौस में

दीवानगी का मोल नहीं बतला कर चला गया दरिया


उनकी हँसी लेकर निकलेगी सुबह एक रोज़

क्या बुराई है इंतज़ार में कह कर चला गया दरिया


छीजता रहा पर चल न सका किनारों की तरह

शरमा कर लहरों से अपनी राह चला गया दरिया

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कोई दीवाना नहीं आता आजकल इन गलियों में

चाँदनी रोती रही फिर तनहाई से लिपट कर आँसू जमा करती रही रात चादर बिछा कर क्या कुछ न कहा उनसे इजहार-ए-हाल के सिवा वो भी सुनते रहे फ़ासलों का समंदर बिछा कर फिर जो पूछा जिंदगी से क्या चाहिए आखिर तुम्ह

 
 
 
कर लिया सख्त इरादा अपना

जुबां पर सख्त है पहरा तो कर लिया सख्त इरादा अपना उठाया गया जो महफिल से हो गया मुकाबिल-ए-हुस्न आशिकी अपना लिया हाथ में पैमाना तो दिल...

 
 
 

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