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ठोकरें सँभाल कर रखना

nirajnabham
12 जन॰ 2025
1 मिनट पठन

ये इश्क है बेवफ़ाई भी सँभाल कर रखना

दर्द ए दिल सरमाया है सँभाल कर रखना

 

सकपकाने पे मेरे कितना हँसी थी तुम

इस हँसी को ताउम्र सँभाल कर रखना

 

गम-ए-हस्ती में जल गई वहशत दिल की

बेरुखी निगाह की अपनी सँभाल कर रखना

 

हँसता हूँ तन्हाइयों में खबर आम है

तोहमतें तमाम तू सँभाल कर रखना

 

छोटी- छोटी ख्वाहिशें गमलों में खिले फूल

सी लूँ चाक दामन बहार सँभाल कर रखना

 

मिलूँगा हर मोड़ पर पहचान पाओगे क्या

जिंदगी है निगाह-ए-नाज सँभाल कर रखना

 

रंग-ओ-बू, गम-ओ-निशात है कैद हर जर्रे में

मंसूब ए वक्त है बस ठोकरें सँभाल कर रखना

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कोई दीवाना नहीं आता आजकल इन गलियों में

चाँदनी रोती रही फिर तनहाई से लिपट कर आँसू जमा करती रही रात चादर बिछा कर क्या कुछ न कहा उनसे इजहार-ए-हाल के सिवा वो भी सुनते रहे फ़ासलों का समंदर बिछा कर फिर जो पूछा जिंदगी से क्या चाहिए आखिर तुम्ह

 
 
 
कर लिया सख्त इरादा अपना

जुबां पर सख्त है पहरा तो कर लिया सख्त इरादा अपना उठाया गया जो महफिल से हो गया मुकाबिल-ए-हुस्न आशिकी अपना लिया हाथ में पैमाना तो दिल...

 
 
 

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