कोई दीवाना नहीं आता आजकल इन गलियों में
चाँदनी रोती रही फिर तनहाई से लिपट कर
आँसू जमा करती रही रात चादर बिछा कर
क्या कुछ न कहा उनसे इजहार-ए-हाल के सिवा
वो भी सुनते रहे फ़ासलों का समंदर बिछा कर
फिर जो पूछा जिंदगी से क्या चाहिए आखिर तुम्हें
कहने लगा थक गया हूँ मैं भी यही सोच-सोच कर
जब भी आते हैं ख्वाब में तो परदा नहीं करते
जब भी मिलते हैं तो बख्तर पर नेजे सजा कर
न उठा हाथ पेशानी तक सलाम में वो नाराज हो गया
हाथ पेट पर था मेरा वे बैठे थे दस्तरख्वान बिछा कर
कोई दीवाना नहीं आता आजकल इन गलियों में
बहार नहीं आई रहे बैठे गालों में गुलाल लगा कर

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