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कहीं जाने को दिल नहीं करता

nirajnabham
28 जुल॰ 2024
1 मिनट पठन

जहाँ में रहूँ तो रहने का भी दिल नहीं करता

मौज ए वक्त गिनता रहूँ बैठे दिल नहीं करता

 

खिल रहे हैं फूल कितने हसरतों के वीरानों में

कुछ नहीं बदलेगा मानने को दिल नहीं करता

 

सुबह खिली थी कली शाम को जो ढल गई

बेवफा कहने का फूलों को दिल नहीं करता

 

उसके दामन का साया दोपहर की धूप में

ख्वाब से ऐसे जागने को दिल नहीं करता

 

देखा जो उनकी आँखों में तो बस डूब ही गया

खुद पर यकीन करने को भी दिल नहीं करता

 

परत-दर-परत वो उतारता रहा चेहरा अपना

कितने बदल गए हो कहने का दिल नहीं करता

 

कभी शुमार न थे मेरी ख्वाहिशों में हमसफर

दास्तान तन्हाइयों का सुनाने को दिल नहीं करता

 

ये कौन कर रहा है इंतजार मेरा सरे बाजार

मुसाफिर का कहीं जाने को दिल नहीं करता।

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चाँदनी रोती रही फिर तनहाई से लिपट कर आँसू जमा करती रही रात चादर बिछा कर क्या कुछ न कहा उनसे इजहार-ए-हाल के सिवा वो भी सुनते रहे फ़ासलों का समंदर बिछा कर फिर जो पूछा जिंदगी से क्या चाहिए आखिर तुम्ह

 
 
 
कर लिया सख्त इरादा अपना

जुबां पर सख्त है पहरा तो कर लिया सख्त इरादा अपना उठाया गया जो महफिल से हो गया मुकाबिल-ए-हुस्न आशिकी अपना लिया हाथ में पैमाना तो दिल...

 
 
 

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